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सोलिगा जनजाति ने ‘फोर्ट्रेस कंजर्वेशन’ दृष्टिकोण को चुनौती दी

Briovo· 29 Jul 2026, 06:01 am IST
सोलिगा जनजाति ने ‘फोर्ट्रेस कंजर्वेशन’ दृष्टिकोण को चुनौती दी

एक नए शोध लेख में वन्यजीव प्रबंधन में "फोर्ट्रेस कंजर्वेशन दृष्टिकोण" की कमियों पर प्रकाश डाला गया है, जो अक्सर स्वदेशी समुदायों को विस्थापित करता है। "इकोसिस्टम्स एंड पीपल" में प्रकाशित अध्ययन कर्नाटक के बिलिगिरि रंगस्वामी मंदिर वन्यजीव अभयारण्य (BRTWS) के सोलिगा लोगों को सफल पारंपरिक वन प्रबंधन के एक प्रमुख उदाहरण के रूप में उद्धृत करता है। सोलिगाओं ने हजारों वर्षों से बाघों और हाथियों जैसे वन्यजीवों के साथ सह-अस्तित्व में रहते हुए, टिकाऊ प्रथाओं और सांस्कृतिक अनुष्ठानों को नियोजित किया है जो संरक्षण के लिए एक एकीकृत दृष्टिकोण प्रदर्शित करते हैं। शोध स्वदेशी ज्ञान को पहचानने और स्थानीय समुदायों को शामिल करने वाले सह-प्रबंधन मॉडल विकसित करने की वकालत करता है।

AI सारांश

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‘फोर्ट्रेस कंजर्वेशन’ को चुनौती

‘इकोसिस्टम्स एंड पीपल’ नामक जर्नल में प्रकाशित एक नए शोध लेख में 'फोर्ट्रेस कंजर्वेशन दृष्टिकोण' की आलोचना की गई है, जो अक्सर संरक्षण के नाम पर स्वदेशी लोगों को विस्थापित कर देता है। यह दृष्टिकोण सदियों से स्वदेशी समुदायों के लिए विस्थापन और संकट का कारण बना है। इसके बजाय, यह अध्ययन वैकल्पिक, समुदाय-आधारित मॉडलों की वकालत करता है।

सोलिगा: सह-अस्तित्व का एक मॉडल

यह अध्ययन कर्नाटक के बिलिगिरि रंगस्वामी मंदिर वन्यजीव अभयारण्य (BRTWS) के सोलिगा लोगों को सफल पारंपरिक वन प्रबंधन के एक प्रमुख उदाहरण के रूप में उजागर करता है। सोलिगा हजारों वर्षों से बाघों, तेंदुओं और हाथियों सहित विविध वन्यजीवों के साथ सद्भाव में रहते आए हैं। उनकी प्रथाएं पारिस्थितिकी तंत्र की गतिशीलता और टिकाऊ संसाधन उपयोग की गहरी समझ को दर्शाती हैं।

स्वदेशी ज्ञान का एकीकरण

यह शोध वन प्रबंधन में आदिवासी लोगों के ज्ञान और कौशल को पहचानने और एकीकृत करने की महत्वपूर्ण आवश्यकता पर जोर देता है। सोलिगा बुजुर्गों ने अपने सांस्कृतिक अनुष्ठानों और प्रथाओं के बारे में जानकारी साझा की, जो प्रकृति के साथ उनके संबंध का अभिन्न अंग हैं। यह समग्र दृष्टिकोण पारंपरिक संरक्षण विधियों के बिल्कुल विपरीत है जो अक्सर मानवीय तत्वों को बाहर कर देती हैं।

सह-प्रबंधन की ओर मार्ग

लेख स्थानीय नियमों और सांस्कृतिक संदर्भों का सम्मान करने वाले सह-शासन और सह-प्रबंधन मॉडल विकसित करने की सिफारिश करता है। इसमें वन विभाग के प्रतिनिधियों, सोलिगा बुजुर्गों और शोधकर्ताओं के साथ सहयोगी समूह स्थापित करना शामिल है। पवित्र स्थलों की मैपिंग और निगरानी के लिए जीआईएस जैसे आधुनिक उपकरणों के साथ समुदायों को सशक्त बनाने का भी सुझाव दिया गया है ताकि उनकी प्रबंधन क्षमताओं को बढ़ाया जा सके।

सहयोगी संरक्षण के लाभ

प्राकृतिक प्रणालियों के अपने गहन ज्ञान वाले स्वदेशी समुदायों को शामिल करना एक जीत की स्थिति प्रदान करता है, जो मानव कल्याण और वन्यजीव संरक्षण दोनों का समर्थन करता है। BRTWS का उदाहरण सामुदायिक-आधारित संरक्षण के लागत प्रभावी लाभों को दर्शाता है, जो सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) के अनुरूप है और व्यापक समाज के लिए पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं को सुनिश्चित करता है।

क्यों मायने रखता है

यह अध्ययन सतत वन्यजीव संरक्षण के लिए एक मॉडल प्रदान करता है जो स्वदेशी अधिकारों और ज्ञान का सम्मान करता है, जिससे विश्व स्तर पर अधिक प्रभावी और न्यायसंगत संरक्षण रणनीतियाँ बन सकती हैं। यह पारंपरिक संरक्षण प्रतिमानों को चुनौती देता है जो अक्सर स्थानीय समुदायों को बाहर कर देते हैं।

मुख्य तथ्य

  • Research Publication: Ecosystems and People journal
  • Indigenous Community Featured: Soliga people
  • Location: Biligiri Rangaswamy Temple Wildlife Sanctuary (BRTWS), Karnataka
  • Research Period: Workshops between 2022-2023, discussions since 2017
  • Authors' Affiliations: Charles Darwin University, Institute for Social and Economic Change, Ashoka Trust for Research in Ecology and the Environment

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