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जम्मू-कश्मीर HC: मातृत्व अवकाश संवैधानिक अधिकार

Briovo· 11 Jul 2026, 05:53 pm IST
जम्मू-कश्मीर HC: मातृत्व अवकाश संवैधानिक अधिकार

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि मातृत्व अवकाश महिलाओं की गरिमा में निहित एक संवैधानिक अधिकार है, न कि राज्य द्वारा दी गई कोई दान. कोर्ट ने उस सरकारी आदेश को रद्द कर दिया जिसने महिला डॉक्टरों के मातृत्व अवकाश के दौरान वेतन रोक दिया था, और प्रशासन को उनका पूरा वेतन और भत्ते जारी करने का निर्देश दिया. यह फैसला वरिष्ठ रेजिडेंट डॉक्टरों और ट्यूटर्स द्वारा दायर एक याचिका के जवाब में आया, जिन्होंने मातृत्व अवकाश लाभों को बढ़ाने वाले एक सरकारी आदेश के बावजूद उनके वेतन को रोके जाने को चुनौती दी थी. कोर्ट ने जोर देकर कहा कि सवैतनिक मातृत्व अवकाश का अधिकार मनमाने कार्यकारी आदेशों से नहीं छीना जा सकता और यह अवकाश का एक अभिन्न अंग है.

AI सारांश

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संवैधानिक अधिकार, दान नहीं

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट ने स्पष्ट रूप से घोषणा की है कि मातृत्व अवकाश महिलाओं का एक मौलिक संवैधानिक अधिकार है. यह अधिकार महिलाओं की गरिमा में गहराई से निहित है और इसे राज्य से एक विवेकाधीन लाभ या दान के रूप में नहीं देखा जा सकता. कोर्ट का यह फैसला इस अधिकार की अंतर्निहित प्रकृति पर जोर देते हुए एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल कायम करता है.

वेतन रोकने के आदेश को रद्द किया

हाई कोर्ट ने स्वास्थ्य और चिकित्सा शिक्षा विभाग द्वारा 14 अक्टूबर, 2025 को जारी एक आदेश को रद्द कर दिया. इस आदेश में, वित्त विभाग की सलाह पर, महिला डॉक्टरों को उनके मातृत्व अवकाश के दौरान 'कार्य से बाहर' होने का हवाला देते हुए वेतन रोक दिया गया था. कोर्ट ने इस कार्यकारी आदेश को मनमाना और महिलाओं के अधिकारों का सीधा उल्लंघन पाया.

डॉ. सोनाक्षी गुप्ता और अन्य का मामला

यह फैसला डॉ. सोनाक्षी गुप्ता और सरकारी मेडिकल कॉलेजों में कार्यरत अन्य वरिष्ठ रेजिडेंट डॉक्टरों और ट्यूटर्स द्वारा दायर एक याचिका से आया. उन्होंने मातृत्व अवकाश के दौरान वेतन और भत्ते से इनकार करने को चुनौती दी थी, जबकि 8 जुलाई, 2024 के एक पिछले सरकारी आदेश ने उन्हें मातृत्व अवकाश लाभ दिया था. याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि उन्हें कभी सूचित नहीं किया गया था कि मातृत्व अवकाश लेने से वेतन रोक दिया जाएगा.

प्रशासन के तर्क को खारिज किया

केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता 2020 के अकादमिक व्यवस्था नियमों के तहत संविदा-आधारित थे और नियमित सरकारी कर्मचारी नहीं थे, इसलिए वे सवैतनिक मातृत्व अवकाश के हकदार नहीं थे. हाई कोर्ट ने इस बात को खारिज करते हुए कहा कि 8 जुलाई, 2024 के सरकारी आदेश ने उन्हें प्रचलित नियमों के अनुसार मातृत्व अवकाश दिया था, जिसमें स्वाभाविक रूप से वेतन और भत्ते शामिल थे.

वित्तीय अधिकार बरकरार

कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि सवैतनिक मातृत्व अवकाश का अधिकार स्वयं अवकाश का एक अविभाज्य अंग है; वेतन रोकने से इसका मूल उद्देश्य विफल हो जाता है. परिणामस्वरूप, जम्मू-कश्मीर प्रशासन को याचिकाकर्ताओं को मातृत्व अवकाश अवधि के लिए उनका पूरा वेतन और भत्ते जारी करने का निर्देश दिया गया. यह कार्रवाई मातृत्व लाभों के वित्तीय सुरक्षा पहलू को मजबूत करती है.

क्यों मायने रखता है

जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट का यह फैसला एक महत्वपूर्ण मिसाल कायम करता है, जो इस बात पर जोर देता है कि मातृत्व अवकाश महिलाओं के लिए एक मौलिक संवैधानिक अधिकार है, न कि कोई विवेकाधीन लाभ. यह महिला कर्मचारियों को उनके मातृत्व अवधि के दौरान मनमाने वेतन कटौती से बचाता है, उनकी वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करता है और उनकी गरिमा को बनाए रखता है. यह निर्णय पूरे भारत में भविष्य की नीतियों को प्रभावित कर सकता है, जिससे कामकाजी महिलाओं के लिए बेहतर मातृत्व लाभ सुनिश्चित हो सकें.

मुख्य तथ्य

  • Court Ruling: Maternity leave is an unassailable constitutional right, not state charity.
  • Case Origin: Petition by Dr. Sonakshi Gupta and other senior residents/tutors against salary stoppage during maternity leave.
  • Affected Group: Women doctors (senior residents and tutors) in government medical colleges.
  • Challenged Order: October 14, 2025, communication denying salaries during maternity leave.
  • Court Directive: Quashed the communication and ordered full salary and allowances released.

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