दिल्ली हाई कोर्ट ने चुनाव आयोग से पूछा, क्या शिक्षक अनिवार्य रूप से मतदाता सूची के…
दिल्ली हाई कोर्ट ने चुनाव आयोग द्वारा सरकारी स्कूल के शिक्षकों को मतदाता सूची संशोधन कार्य में अनिवार्य रूप से लगाने पर सवाल उठाया है। एक याचिका ने कक्षाओं में व्यवधान पर चिंता जताई और पहले गैर-शिक्षण कर्मचारियों का उपयोग करने की वकालत की। मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ ने चुनाव आयोग से एक संक्षिप्त हलफनामा मांगा, जिसमें पूछा गया कि क्या ऐसी तैनाती अनिवार्य हो सकती है। चुनाव आयोग ने कहा कि शिक्षक केवल गैर-शिक्षण घंटों/छुट्टियों के दौरान काम करते हैं और उन्हें मुआवजा दिया जाता है, जिनमें से केवल 10-14% को बुलाया जाता है। अदालत ने टिप्पणी की कि भागीदारी स्वैच्छिक होनी चाहिए, अनिवार्य नहीं, और चुनाव आयोग द्वारा अपना जवाब दाखिल करने के बाद 28 जुलाई को इस मामले की सुनवाई करेगी।
AI सारांश
3 bulletsहाई कोर्ट ने शिक्षकों की अनिवार्य तैनाती पर सवाल उठाया
दिल्ली हाई कोर्ट ने मतदाता सूची के चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण के लिए सरकारी स्कूल के शिक्षकों की अनिवार्य तैनाती के संबंध में चुनाव आयोग से स्पष्टीकरण मांगा है। मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ ने छात्रों की शिक्षा पर पड़ने वाले प्रभाव पर चिंता जताई।
याचिका में बाधित कक्षाओं पर प्रकाश डाला गया
वकीलों राजेश कुमार गोगना और अशोक अग्रवाल द्वारा दायर याचिका में तर्क दिया गया है कि शिक्षकों की इतनी बड़ी संख्या में तैनाती कक्षाओं को बाधित करती है और लाखों छात्रों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है। इसमें कहा गया है कि कुछ स्कूलों में, पूरे संकाय को हटा दिया जाता है, जिससे अतिथि शिक्षक या गैर-संबंधित विषयों के शिक्षक पर्यवेक्षण करते हैं।
स्वैच्छिक भागीदारी पर चुनाव आयोग का रुख
चुनाव आयोग के वकील ने कहा कि विशेष गहन पुनरीक्षण एक अखिल भारतीय अभ्यास है और शिक्षकों को केवल गैर-शिक्षण घंटों या छुट्टियों के दौरान आवश्यक होता है, जिसके लिए मुआवजा प्रदान किया जाता है। उन्होंने यह भी दावा किया कि अनुरोध किए गए शिक्षकों में से केवल 10-14% ही अंततः तैनात किए जाते हैं।
न्यायालय ने स्वैच्छिक भागीदारी पर जोर दिया
हाई कोर्ट ने मौखिक रूप से टिप्पणी की कि भागीदारी स्वैच्छिक होनी चाहिए, संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत इसे अनिवार्य बनाने की चुनाव आयोग की शक्ति पर सवाल उठाया। पीठ ने देखा कि शिक्षक चुनाव आयोग के कर्मचारी नहीं हैं और निर्देशों का पालन करने से इनकार करना एक दंडनीय अपराध है, जिससे शिक्षकों के लिए एक दुविधा पैदा होती है।
अगले कदम और संभावित प्रभाव
अदालत ने चुनाव आयोग को सोमवार तक अपना रुख स्पष्ट करते हुए एक संक्षिप्त हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है, अगली सुनवाई 28 जुलाई को निर्धारित है। यह फैसला देशव्यापी चुनावी ड्यूटी के लिए शिक्षकों की तैनाती के तरीके को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित कर सकता है, जिससे ऐसी नीतिगत बदलाव हो सकते हैं जो शैक्षिक निरंतरता को प्राथमिकता देते हैं।
क्यों मायने रखता है
चुनावी ड्यूटी के लिए शिक्षकों की तैनाती अक्सर नियमित कक्षाओं को बाधित करती है, जिससे छात्रों के शिक्षा के अधिकार पर असर पड़ता है। यह मामला मतदान ड्यूटी कैसे सौंपी जाती है, इस पर एक मिसाल कायम कर सकता है, जिससे शिक्षण घंटों की सुरक्षा हो सकती है और शैक्षिक निरंतरता सुनिश्चित हो सकती है।
मुख्य तथ्य
- •Court: Delhi High Court
- •Bench: Chief Justice DK Upadhyaya & Justice Tejas Karia
- •Next Hearing: July 28
- •Petitioners: Rajesh Kumar Gogna & Ashok Agarwal
- •Teacher Deployment (EC claim): 10-14% are called
- •Issue: Mandatory deployment of teachers for electoral roll revision
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