सोनम वांगचुक का अनशन, लंबी भूख हड़तालों पर बहस तेज
सोनम वांगचुक के NEET अनियमितताओं के खिलाफ चल रहे आमरण अनशन के बीच, भारत के महत्वपूर्ण भूख हड़तालों का इतिहास फिर से सामने आया है। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर 28 जून से विरोध कर रहे वांगचुक का 9 किलो वजन कम हो गया है और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है। यह इरोम शर्मिला के AFSPA हटाने के लिए 16 साल के उपवास, अवैध खनन के खिलाफ स्वामी निगमानंद के 115 दिनों के उपवास, जिसमें उनका निधन हो गया था, और भगत सिंह की जेल में 116 दिनों की भूख हड़ताल जैसे पिछले आंदोलनों पर प्रकाश डालता है। अन्य प्रमुख हस्तियों में अन्ना हजारे, जतिन दास (63 दिनों के बाद निधन), पोट्टी श्रीरामुलु (आंध्र राज्य के लिए 58 दिनों के बाद निधन), और महात्मा गांधी शामिल हैं, जिनका सबसे लंबा उपवास 21 दिनों का था। किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल ने भी एमएसपी के लिए 131 दिनों का उपवास रखा था।
AI सारांश
3 bulletsवांगचुक का अनशन और अस्पताल में भर्ती
सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने NEET पेपर लीक और प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताओं के विरोध में 28 जून से दिल्ली के जंतर-मंतर पर आमरण अनशन शुरू किया है। वह केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। लंबे अनशन के कारण, वांगचुक का लगभग 9 किलोग्राम वजन कम हो गया है और स्वास्थ्य बिगड़ने के बाद शुक्रवार सुबह उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया।
इरोम शर्मिला का ऐतिहासिक 16 साल का उपवास
लेख मणिपुर में सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम (AFSPA) को हटाने की मांग को लेकर इरोम चानू शर्मिला की रिकॉर्ड-तोड़ 16 साल की भूख हड़ताल पर प्रकाश डालता है। उनके अहिंसक विरोध ने अपने शांतिपूर्ण स्वभाव के लिए अंतरराष्ट्रीय ध्यान आकर्षित किया। उनके समर्पण ने कई लोगों को प्रेरित किया और प्रतिरोध का प्रतीक बन गया।
न्याय के लिए बलिदान: स्वामी निगमानंद
पर्यावरणविद् स्वामी निगमानंद सरस्वती, जिन्हें 'गंगा पुत्र' के नाम से जाना जाता है, ने हरिद्वार में गंगा में अवैध रेत खनन के खिलाफ 2011 में 115 दिनों तक उपवास किया था। उनका स्वास्थ्य गंभीर रूप से बिगड़ गया, जिससे वे कोमा में चले गए और अंततः 13 जून 2011 को उनका निधन हो गया। उनके बलिदान ने गंगा नदी से संबंधित पर्यावरणीय चिंताओं को रेखांकित किया।
क्रांतिकारी भूख हड़तालें: भगत सिंह और जतिन दास
शहीद भगत सिंह और उनके साथियों ने 1929 में लाहौर जेल में 116 दिनों की भूख हड़ताल की थी, जिसमें भारतीय राजनीतिक कैदियों के लिए बेहतर व्यवहार और बुनियादी सुविधाओं की मांग की गई थी। स्वतंत्रता सेनानी जतिन दास ने भी कैदियों के अधिकारों के लिए उसी जेल में 63 दिनों तक उपवास किया था, और 13 सितंबर 1929 को अपने उपवास के दौरान उनका निधन हो गया। ये हड़तालें औपनिवेशिक शासन के खिलाफ प्रतिरोध के प्रतीक बन गईं।
महात्मा गांधी के नैतिक विरोध
महात्मा गांधी ने सामाजिक सुधार और स्वतंत्रता आंदोलनों के लिए अक्सर उपवास को एक उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया। उनका सबसे लंबा उपवास 21 दिनों तक चला, जो 1933 में अस्पृश्यता को खत्म करने और 1943 में ब्रिटिश हिरासत के खिलाफ विरोध के रूप में किया गया था। ये उपवास नैतिक चेतना बढ़ाने और जन समर्थन जुटाने में सहायक थे।
आधुनिक वकालत: अन्ना हजारे और डल्लेवाल
हाल की भूख हड़तालों में अन्ना हजारे का 2011 का जन लोकपाल विधेयक के लिए भ्रष्टाचार विरोधी उपवास शामिल है, जो 12-13 दिनों तक चला, और किसानों के मुद्दों के लिए उनका 2018 का उपवास भी। किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल ने नवंबर 2024 से अप्रैल 2025 तक 131 दिनों का उपवास किया, जिसमें फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की कानूनी गारंटी की मांग की गई थी। ये समकालीन आंदोलन सार्वजनिक शिकायतों को उजागर करना जारी रखते हैं।
क्यों मायने रखता है
सोनम वांगचुक का उपवास अहिंसक विरोध की शक्ति पर प्रकाश डालता है और भारत के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य को आकार देने वाले ऐतिहासिक भूख हड़तालों पर ध्यान आकर्षित करता है।
मुख्य तथ्य
- •Sonam Wangchuk's Protest Duration: Ongoing since June 28
- •Sonam Wangchuk's Weight Loss: Approx. 9 kg
- •Irom Sharmila's Fast Duration: Approx. 16 years
- •Swami Nigamanand's Fast Duration: 115 days
- •Bhagat Singh's Hunger Strike…: 116 days
- •Jagjit Singh Dallewal's Fast…: 131 days
क्या यह मददगार था?
Reader pulse
0 votesGenerate a 5-question quiz from this article.
चर्चा
Discussion (0)
Loading…