सुप्रीम कोर्ट ने IPS अधिकारी को प्रसव के बाद ट्रेनिंग पर तत्काल राहत देने से किया…
सुप्रीम कोर्ट ने 2023 बैच की आईपीएस अधिकारी उर्वशी सेंगर को तत्काल राहत देने से इनकार कर दिया। सेंगर ने 1993 के गृह मंत्रालय की उस नीति को चुनौती दी थी, जो महिला परिवीक्षाधीनों को बच्चे के जन्म के बाद एक साल तक प्रशिक्षण से रोकती है। कोर्ट ने कहा कि सेंगर बीच में चल रहे प्रशिक्षण में शामिल नहीं हो सकतीं, क्योंकि नौ हफ्तों में से तीन पूरे हो चुके थे। यह नीति सुरक्षा के लिए है, नुकसान पहुंचाने के लिए नहीं। हालांकि, याचिका खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट) को उनकी मूल याचिका गुण-दोष के आधार पर सुनने का निर्देश दिया और पुष्टि की कि उनकी वरिष्ठता प्रभावित नहीं होगी। केंद्र ने तर्क दिया था कि छूट देने से एक मिसाल बन सकती है, लेकिन कोर्ट ने मामले-दर-मामले मूल्यांकन का सुझाव दिया।
AI सारांश
3 bulletsसुप्रीम कोर्ट ने प्रसवोपरांत प्रशिक्षण अवकाश पर गृह…
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को केंद्रीय गृह मंत्रालय के 1993 के एक कार्यालय ज्ञापन (ओएम) को बरकरार रखा, जो महिला आईपीएस परिवीक्षाधीनों के लिए बच्चे के जन्म के बाद प्रशिक्षण से एक साल का अंतराल अनिवार्य करता है। कोर्ट ने 2023 बैच की आईपीएस अधिकारी उर्वशी सेंगर को तत्काल राहत देने से इनकार कर दिया, जिन्होंने इस नीति को चुनौती दी थी। कोर्ट ने कहा कि नौ हफ्तों में से तीन हफ्ते पूरे हो जाने के कारण वह चल रहे प्रशिक्षण सत्र में बीच में शामिल नहीं हो सकतीं।
नीति का उद्देश्य: सुरक्षा, असुविधा नहीं
जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने टिप्पणी की कि गृह मंत्रालय की नीति का मुख्य उद्देश्य महिलाओं को राहत और सुरक्षा प्रदान करना है, न कि उन्हें अयोग्य ठहराना या नुकसान पहुंचाना। उन्होंने जोर दिया कि तत्काल याचिका खारिज होने के बावजूद, अधिकारी के मौलिक अधिकारों और करियर की प्रगति पर उचित कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से विचार किया जा रहा है।
कैट मूल याचिका की गुणवत्ता पर सुनवाई करेगा
तत्काल राहत देने से इनकार करने के बावजूद, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट) को उर्वशी सेंगर की मूल याचिका पर गुण-दोष के आधार पर सुनवाई करने का निर्देश दिया। केंद्र ने अदालत को यह भी आश्वासन दिया कि सेंगर की वर्तमान प्रशिक्षण कार्यक्रम में शामिल न हो पाने के कारण उनकी वरिष्ठता प्रभावित नहीं होगी, जिससे उनकी करियर प्रगति बरकरार रहेगी।
केंद्र की चिंताएं और मामले-दर-मामले समीक्षा का न्यायालय…
केंद्र ने पहले छूट देने के खिलाफ तर्क दिया था, यह कहते हुए कि लगभग 30% आईपीएस परिवीक्षाधीन महिलाएं हैं और ऐसी छूट एक 'बाढ़' जैसी स्थिति पैदा कर सकती है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया था कि 1993 की नीति को व्यक्तिगत चिकित्सा फिटनेस और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, एक सामान्य नियम के बजाय मामले-दर-मामले आधार पर लागू किया जाना चाहिए।
पिछली कानूनी चुनौतियां और हाई कोर्ट का रुख
उर्वशी सेंगर ने दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा कैट के अंतरिम राहत आदेश को रद्द करने के बाद सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जिसने उन्हें प्रशिक्षण की अनुमति दी थी। हाई कोर्ट ने कैट के आदेश पर रोक लगाते हुए यह फैसला सुनाया था कि महिलाओं को प्रसव के एक साल बाद तक प्रशिक्षण से रोकने वाली नीति मां और बच्चे दोनों के कल्याण और सर्वोत्तम हितों के लिए बनाई गई थी, इस प्रकार गृह मंत्रालय के मूल इरादे को मजबूत किया गया।
क्यों मायने रखता है
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय वर्दीधारी सेवाओं में महिलाओं के लिए मातृत्व अवकाश और प्रशिक्षण से संबंधित पुरानी नीतियों की व्याख्या और उनके प्रयोग को प्रभावित करता है। यह महिलाओं के कल्याण लाभों और व्यक्तिगत करियर आकांक्षाओं को संतुलित करने पर चल रही कानूनी बहस को उजागर करता है, जिससे भविष्य में पेशेवर प्रशिक्षण कार्यक्रमों के लिए अभिभावकीय अवकाश से संबंधित नीतिगत सुधारों पर असर पड़ सकता है।
मुख्य तथ्य
- •Petitioner: Urvashi Sengar, 2023-batch IPS officer
- •Policy Challenged: 1993 MHA Office Memorandum
- •Policy Mandate: One-year training suspension for female IPS probationers post-childbirth
- •Court Ruling: Declined immediate relief, directed CAT to hear original petition
- •Impact on Seniority: Centre affirmed seniority would not be affected
- •Training Status: Three of nine weeks completed at Sardar Vallabhbhai Patel National Police Academy
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