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अमेरिकी सांसद ने भारत के FCRA संशोधनों का किया विरोध

Briovo· 06 Aug 2026, 09:31 pm IST
अमेरिकी सांसद ने भारत के FCRA संशोधनों का किया विरोध

अमेरिकी कांग्रेस सांसद राइली मूर ने भारत के विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA) में प्रस्तावित संशोधनों का कड़ा विरोध किया है। इन संशोधनों का उद्देश्य गैर-सरकारी संगठनों (NGO) के लिए विदेशी फंडिंग पर नियमों को सख्त करना और विशेष रूप से धार्मिक धर्मांतरण के लिए इसके दुरुपयोग को रोकना है। डोनाल्ड ट्रंप की पार्टी के रिपब्लिकन मूर का दावा है कि ये बदलाव ईसाई संगठनों को निशाना बनाते हैं और भारत-अमेरिका संबंधों को नुकसान पहुंचा सकते हैं। भारत सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने और आंतरिक अस्थिरता को रोकने के लिए विदेशी धन को विनियमित करने के अपने संप्रभु अधिकार पर जोर देती है, यह रेखांकित करते हुए कि विदेशी फंडिंग और धार्मिक गतिविधियों के संबंध में अमेरिका में भी इसी तरह के सख्त नियम मौजूद हैं। प्रस्तावित संशोधन पारदर्शिता, जवाबदेही और धर्मांतरण जैसे अनधिकृत उद्देश्यों के लिए धन के डायवर्जन को रोकने पर केंद्रित हैं।

AI सारांश

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अमेरिकी सांसद की चिंता

अमेरिकी कांग्रेस सांसद राइली मूर ने भारत के आगामी FCRA संशोधनों पर कड़ी चिंता व्यक्त की है। उनका दावा है कि ये बदलाव भारत सरकार को चर्चों और धार्मिक चैरिटी संस्थाओं को नियंत्रित करने में सक्षम बनाएंगे, जिसे वह ईसाइयों पर सीधा हमला मानते हैं। मूर ने चेतावनी दी है कि ऐसे विधायी कदम भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच द्विपक्षीय संबंधों में तनाव पैदा कर सकते हैं।

भारत का संप्रभु रुख

भारत का कहना है कि विदेशी अंशदानों को विनियमित करना राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा और आंतरिक अस्थिरता को रोकने का एक संप्रभु अधिकार है। सरकार गैर-सरकारी संगठनों द्वारा विदेशी धन के उपयोग में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाना चाहती है। यह कदम चाणक्य के इस दर्शन के अनुरूप है कि राष्ट्रों को यह सुनिश्चित करने का अधिकार है कि विदेशी सहायता आंतरिक शांति को भंग न करे।

प्रस्तावित प्रमुख संशोधन

प्रस्तावित FCRA संशोधनों के तहत गैर-सरकारी संगठनों को गृह मंत्रालय के साथ पंजीकरण कराना अनिवार्य होगा और नवीनीकरण न करने पर स्वतः रद्द हो जाएगा। महत्वपूर्ण रूप से, ये विदेशी धन का उपयोग धार्मिक धर्मांतरण के लिए प्रतिबंधित करते हैं। इसके अतिरिक्त, जिन गैर-सरकारी संगठनों का पंजीकरण रद्द हो जाता है, उनके विदेशी धन से खरीदी गई संपत्ति एक नामित सरकारी प्राधिकरण के पास वापस चली जाएगी।

मिशनरी फंडिंग पर चिंताएं

मूर की आपत्तियां मुख्य रूप से धर्मांतरण के लिए विदेशी धन पर प्रतिबंध और गैर-सरकारी संगठनों की संपत्ति की निगरानी पर केंद्रित हैं। आलोचकों का सुझाव है कि उनका रुख औपनिवेशिक मानसिकता को दर्शाता है, जो संशोधनों को धार्मिक तटस्थता के बजाय मिशनरी फंडिंग संरक्षण के दृष्टिकोण से देखता है। भारत में ईसाई-संबंधित गैर-सरकारी संगठनों को विशेष रूप से अमेरिका से महत्वपूर्ण विदेशी फंडिंग मिलती है।

वैश्विक समानताएं और प्रभाव

भारत का कहना है कि अमेरिका में भी विदेशी फंडिंग पर सख्त नियम हैं, जिसके तहत विदेशों से धन प्राप्त करने वाले संगठनों के लिए पंजीकरण और विस्तृत रिपोर्टिंग अनिवार्य है, खासकर धार्मिक गतिविधियों के लिए। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अपने लोकतांत्रिक ताने-बाने को अस्थिर होने से रोकने के लिए विदेशी धन को विनियमित करने के राज्य के अधिकार की पुष्टि की है। इन संशोधनों को भारत-विरोधी गतिविधियों के लिए संभावित रूप से उपयोग किए जाने वाले धन पर अधिक निगरानी बढ़ाने के कदम के रूप में देखा जा रहा है।

क्यों मायने रखता है

FCRA संशोधन भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता के लिए महत्वपूर्ण हैं, जिसका उद्देश्य विदेशी धन के दुरुपयोग को रोकना है। अमेरिकी सांसद का विरोध विदेशी हस्तक्षेप और धार्मिक स्वतंत्रता पर अलग-अलग दृष्टिकोणों को उजागर करता है, जो अंतरराष्ट्रीय संबंधों को प्रभावित कर सकता है।

मुख्य तथ्य

  • Proposed Law: Foreign Contribution (Regulation) Act (FCRA) Amendments
  • Opposing US MP: Riley Moore (Republican)
  • Key Amendment Focus: Transparency, accountability, preventing religious conversions via foreign funds
  • Foreign Funding to India: ₹23,000 crore annually (approx), with ₹7,000-8,000 crore from the US
  • NGOs receiving funds: 16,000+ NGOs in India
  • Religious NGOs: 2,257, with 1,626 linked to Christian activities

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